डीआरएस के अंदर: 15 सेकंड का खेल
क्रिकेट में डीआरएस यानी निर्णय समीक्षा प्रणाली मैदानी अंपायर के फैसले की तकनीकी दोबारा जांच करती है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के नियमों के तहत बल्लेबाजी या क्षेत्ररक्षण टीम सीमित रिव्यू लेकर तीसरे....
डीआरएस के अंदर: 15 सेकंड का खेल
क्रिकेट में डीआरएस यानी निर्णय समीक्षा प्रणाली मैदानी अंपायर के फैसले की तकनीकी दोबारा जांच करती है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के नियमों के तहत बल्लेबाजी या क्षेत्ररक्षण टीम सीमित रिव्यू लेकर तीसरे अंपायर से निर्णय बदलने का अनुरोध कर सकती है। आम तौर पर कप्तान या बल्लेबाज को लगभग 15 सेकंड में दोनों हाथों से “टी” का संकेत देना होता है। हॉक-आई गेंद की दिशा, अल्ट्राएज बल्ले का किनारा और हॉट स्पॉट संपर्क की जांच करते हैं। एल्बीडब्ल्यू में पिचिंग, इम्पैक्ट और विकेट तीन निर्णायक चरण हैं, जबकि अंपायर कॉल मूल फैसला कायम रख सकती है। टेस्ट, एकदिवसीय और टी20 में रिव्यू की संख्या अलग हो सकती है। पिच रिपोर्ट पर मैच विश्लेषण पढ़ते समय इन संकेतों को समझना बेहद उपयोगी है। सबसे पहले प्रारूप के आधिकारिक नियम जांचें, फिर रिव्यू का उपयोग भावनाओं से नहीं, प्रमाण से करें।

“निष्पक्ष खेल के लिए सही निर्णय जरूरी है”—यही सोच डीआरएस की बुनियाद है, लेकिन मैदान पर यह कोई जादुई मशीन नहीं। यह उपलब्ध तकनीक, प्रसारण गुणवत्ता, नियमों और मानव व्याख्या का संयुक्त फैसला है। पिच रिपोर्ट के पाठकों के लिए असली फायदा यह है कि डीआरएस समझने से मैच समीक्षा, खिलाड़ी आंकड़े और बल्लेबाजी रणनीति कहीं अधिक स्पष्ट दिखती है। मेरे वर्षों के देखने-खेलने के अनुभव में सबसे महंगी गलती गलत रिव्यू नहीं, बल्कि बिना तैयारी लिया गया रिव्यू रहा है। आगे बढ़ने से पहले क्रिकेट नियमों की शुरुआती मार्गदर्शिका देखना उपयोगी रहेगा।
डीआरएस का उद्देश्य हर फैसला बदलना नहीं, बल्कि साफ गलती पकड़ना है। यही अंतर दर्शक अक्सर भूल जाते हैं और फिर अंपायर कॉल को “गलत तकनीक” समझते हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के आधिकारिक खेल नियमों में निर्णय समीक्षा की प्रक्रिया, समयसीमा और रिव्यू बचने के प्रावधान दिए गए हैं।
डीआरएस की बुनियादी समझ मजबूत करने के लिए यह छोटा कदम उठाइए।
क्या डीआरएस सचमुच गलत फैसले घटाता है?
हाँ, डीआरएस स्पष्ट मानवीय गलतियों को घटाता है, लेकिन यह हर करीबी निर्णय को निर्विवाद नहीं बनाता। हॉक-आई, अल्ट्राएज और तीसरे अंपायर की समीक्षा मिलकर उपलब्ध प्रमाण का मूल्यांकन करते हैं। एल्बीडब्ल्यू में गेंद का स्टंप से टकराना दिखे, फिर भी अंपायर कॉल के कारण मैदानी फैसला बरकरार रह सकता है।
डीआरएस की सबसे बड़ी ताकत उसका बहु-स्तरीय प्रमाण है। पहले तीसरा अंपायर देखता है कि रिव्यू नियमों के अनुसार स्वीकार्य है या नहीं; फिर घटना का क्रम जांचा जाता है। कैच के मामले में अल्ट्राएज से बल्ले का किनारा, वीडियो से गेंद का जमीन छूना और कभी-कभी हॉट स्पॉट से संपर्क देखा जाता है। एल्बीडब्ल्यू में हॉक-आई का अनुमान तीन हिस्सों में बंटता है: गेंद कहां पिच हुई, पैड से कहां लगी और विकेट पर उसका संभावित प्रभाव क्या होता। 2017 से लेकर 2026 तक प्रसारण तकनीक बेहतर हुई है, फिर भी भविष्यवाणी वास्तविक टक्कर नहीं बल्कि मॉडल-आधारित प्रक्षेपण है। यही कारण है कि इंग्लैंड, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की उच्च-स्तरीय श्रृंखलाओं में भी विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुए। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की भावना यह है कि समीक्षा “स्पष्ट और निर्णायक गलती” सुधारने का साधन है, हर संदेह को उलटने का अधिकार नहीं। सुनिए—यही वह हिस्सा है जो मायने रखता है: सफल डीआरएस का अर्थ हमेशा नया फैसला नहीं, बल्कि सही प्रक्रिया का पालन भी हो सकता है।
रिव्यू मांगने की सही प्रक्रिया क्या है?
रिव्यू मांगने के लिए अधिकृत खिलाड़ी या कप्तान को सामान्यतः 15 सेकंड के भीतर दोनों हाथों से “टी” संकेत देना होता है। आउट दिए गए बल्लेबाज को आउट होने की स्थिति में समीक्षा मांगनी होती है, जबकि नॉट आउट फैसले को चुनौती देने का अधिकार क्षेत्ररक्षण कप्तान के पास रहता है। संकेत देर से देने पर अनुरोध अस्वीकार हो सकता है।
व्यावहारिक स्तर पर गेंदबाज, विकेटकीपर और स्लिप क्षेत्ररक्षक पहले प्रतिक्रिया देते हैं, फिर कप्तान निर्णय लेता है। यही वह जगह है जहां टीमों की रणनीति अलग होती है। विराट कोहली, रोहित शर्मा, बेन स्टोक्स और पैट कमिंस जैसे कप्तानों के रिव्यू निर्णयों पर मैच विश्लेषक अक्सर चर्चा करते हैं, लेकिन असली गुणवत्ता केवल नाम से नहीं मापी जा सकती। बल्लेबाज की स्थिति, गेंद का कोण, विकेटकीपर की आवाज और गेंदबाज का आत्मविश्वास—इन सबका मूल्यांकन कुछ सेकंड में होता है। टेलीविजन पर “रिव्यू बचा” दिखना भी नियम-निर्भर है; सफल समीक्षा और अंपायर कॉल सामान्यतः रिव्यू संख्या को बचाते हैं, जबकि पूरी तरह असफल चुनौती खर्च हो जाती है। इसलिए भावनात्मक अपील के बाद तुरंत बटन दबाना महंगा पड़ सकता है।

यहां लागत बचाने वाला नियम सरल है: पहले संकेतों को पढ़िए, फिर समीक्षा लीजिए। पिच रिपोर्ट की एल्बीडब्ल्यू और गेंद की स्विंग समझने वाली मार्गदर्शिका इस निर्णय को अधिक व्यावहारिक बना सकती है।
एल्बीडब्ल्यू जैसे कठिन मामले में डीआरएस कैसे फैसला करता है?
एल्बीडब्ल्यू रिव्यू में तीसरा अंपायर पहले गेंद की वैधता देखता है, फिर पिचिंग, इम्पैक्ट और विकेट का क्रम जांचता है। यदि गेंद स्टंप पर लगने की संभावना अंपायर कॉल सीमा में आती है, तो मैदानी अंपायर का मूल फैसला बरकरार रहता है। इसलिए समीक्षा के बाद भी आउट या नॉट आउट परिणाम बदलना जरूरी नहीं है।
एल्बीडब्ल्यू में सबसे पहले नो-बॉल जांचना महत्वपूर्ण है, क्योंकि कमर से ऊपर की नो-बॉल पर एल्बीडब्ल्यू संभव नहीं। इसके बाद हॉक-आई गेंद की यात्रा का त्रि-आयामी मॉडल बनाता है। मान लीजिए गेंद लेग स्टंप के बाहर पिच हुई; ऐसी स्थिति में बल्लेबाज को विकेट के सामने पकड़े जाने पर भी एल्बीडब्ल्यू नहीं दिया जा सकता, जब तक वह शॉट खेलने का प्रयास कर रहा हो और संबंधित नियम लागू हों। इम्पैक्ट भी निर्णायक है: पैड से टकराने का स्थान स्टंप की रेखा के बाहर या भीतर हो सकता है। अंतिम चरण में गेंद का अनुमानित रास्ता विकेट के ऊपर, किनारे या बाहर दिखाया जाता है। यहां 50 प्रतिशत से अधिक अनुमान भी हमेशा फैसला पलटने के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता, क्योंकि अंपायर कॉल की सीमा लागू हो सकती है। यह तकनीकी बारीकी भारत बनाम इंग्लैंड टेस्ट, पाकिस्तान बनाम ऑस्ट्रेलिया श्रृंखला और इंडियन प्रीमियर लीग में बार-बार सामने आती है।
हॉक-आई का अनुमान मौसम, कैमरा कोण और गेंद की गति से प्रभावित हो सकता है। इसलिए तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह या शाहीन शाह अफरीदी की सीम मूवमेंट वाली गेंदों पर शुरुआती दृश्य और अंतिम प्रक्षेपण में फर्क दिखना असामान्य नहीं। व्यावहारिक सलाह यह है कि बल्लेबाज अपनी क्रीज स्थिति, फ्रंट-पैड और गेंद की पिचिंग को साथ देखकर निर्णय समझे; केवल लाल या हरे ग्राफिक पर निर्भर न रहे। Source: हॉक-आई की आधिकारिक तकनीकी जानकारी गेंद ट्रैकिंग को दृश्य प्रक्षेपण के रूप में प्रस्तुत करती है, प्रत्यक्ष कैमरा रिकॉर्डिंग के रूप में नहीं। यह छोटा फर्क दर्शक को अंपायर कॉल के पीछे का तर्क समझाता है।
एल्बीडब्ल्यू रिव्यू पर रणनीतिक विवरण यहां देखें और अपनी मैच-पढ़ने की क्षमता सुधारें।
अंपायर कॉल और तकनीकी सीमाओं में क्या होता है?
अंपायर कॉल का अर्थ है कि तकनीकी समीक्षा निर्णायक सीमा तक स्पष्ट नहीं पहुंची, इसलिए मैदानी अंपायर का प्रारंभिक निर्णय कायम रहता है। यह अलग से कोई नया फैसला नहीं, बल्कि अनिश्चितता को संभालने का नियम है। कैच, बल्ले के किनारे और रन-आउट में भी कैमरा कोण, आवाज और फ्रेम की गुणवत्ता सीमाएं पैदा कर सकती है।
अल्ट्राएज को लेकर भी दर्शकों की अपेक्षा अक्सर अवास्तविक होती है। माइक्रोफोन में दिखने वाली छोटी तरंग बल्ले, पैड, जमीन या बल्ले के पास हवा की आवाज से बन सकती है। तीसरा अंपायर केवल एक ऊंची रेखा देखकर निर्णय नहीं करता; उसे बल्ले और गेंद की तस्वीरों को समय-क्रम में मिलाना पड़ता है। हॉट स्पॉट इन्फ्रारेड संकेत से संपर्क का स्थान दिखा सकता है, लेकिन हर स्टेडियम, हर प्रसारण साझेदार और हर मौसम में उसका परिणाम समान स्पष्ट नहीं होता। ऑस्ट्रेलिया का क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया प्रसारण ढांचा, भारत का भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड और दक्षिण अफ्रीका का सुपरस्पोर्ट अलग उत्पादन व्यवस्थाओं में काम करते हैं, इसलिए उपलब्ध दृश्य सामग्री मैच-दर-मैच बदल सकती है। 2026 में भी डीआरएस “सत्य मशीन” नहीं है; वह प्रमाणों को नियमों के भीतर तौलने वाली सहायता प्रणाली है। यही कारण है कि मूल अंपायर का फैसला कभी-कभी तकनीकी स्क्रीन के बाद भी बचा रहता है।

एक उपयोगी, कम चर्चित संकेत यह है कि गेंद के बल्ले से गुजरने और अल्ट्राएज उछाल के बीच समय-संबंध देखा जाता है। यदि ध्वनि पहले या बाद में आती है, तो तीसरा अंपायर उसे गेंद-बल्ला संपर्क का मजबूत प्रमाण नहीं मान सकता। इसी तरह रन-आउट में बेल के पूरी तरह गिरने का क्षण और क्रीज के पीछे बल्ले की स्थिति अलग-अलग फ्रेम में जांची जाती है। क्रिकेट में तकनीकी फैसलों का विश्लेषण पढ़ने से यह स्पष्ट होगा कि धीमी गति का दृश्य हमेशा निर्णायक क्यों नहीं होता।
डीआरएस कहां असफल हो सकता है?
डीआरएस तब कमजोर पड़ सकता है जब कैमरा कोण अपर्याप्त हो, गेंद का संपर्क अस्पष्ट हो, ध्वनि में शोर हो या तकनीकी मॉडल को अनुमान लगाना पड़े। रिव्यू की सीमा, अंपायर कॉल और सीमित प्रसारण कैमरे इसके प्रमुख कारण हैं। इसलिए तकनीक गलती घटाती है, पर मानवीय व्याख्या और नियमों की आवश्यकता समाप्त नहीं करती।
साफ-साफ कहें तो डीआरएस के चार कमजोर बिंदु हैं:
- कैमरा सीमा: यदि बल्ले और गेंद का संपर्क छिपा हो, तो अल्ट्राएज भी अकेला पर्याप्त नहीं।
- ध्वनि भ्रम: स्टेडियम का शोर, बल्ले का जमीन से टकराना और पैड की आवाज समान समय पर रिकॉर्ड हो सकती है।
- गेंद ट्रैकिंग अनुमान: हॉक-आई गेंद के आगे के रास्ते का मॉडल बनाता है; वह भविष्य की टक्कर का प्रत्यक्ष वीडियो नहीं।
- नियमों की जटिलता: अंपायर कॉल, नो-बॉल, बल्लेबाज का शॉट और विकेट की स्थिति मिलकर परिणाम बदल सकते हैं।
मेरे अनुभव में दर्शक सबसे ज्यादा तब भ्रमित होते हैं जब रिप्ले कई बार दिखाया जाता है, लेकिन निर्णायक फ्रेम कभी साफ नहीं आता। ऐसे मामलों में सोशल मीडिया की तेज राय से अधिक भरोसा तीसरे अंपायर के कारणयुक्त निर्णय पर होना चाहिए। Source: मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब के आधिकारिक नियम में एल्बीडब्ल्यू, कैच और रन-आउट की मूल परिभाषाएं दी गई हैं; डीआरएस उन नियमों को बदलता नहीं, केवल समीक्षा प्रक्रिया उपलब्ध कराता है। इसे समझना जरूरी है, क्योंकि तकनीकी विवाद अक्सर नियम की गलत पढ़ाई से पैदा होता है।
क्या आप समीक्षा की सीमाओं और नियमों का मिलान करके अगला मैच देखना चाहते हैं? यह संदर्भ सुरक्षित रखें।
क्या आज डीआरएस को समझना आपके लिए उपयोगी है?
हाँ, डीआरएस समझना हर गंभीर क्रिकेट दर्शक के लिए उपयोगी है, खासकर यदि वह एल्बीडब्ल्यू, कैच और रणनीतिक कप्तानी का गहरा विश्लेषण करना चाहता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि दर्शक स्क्रीन के रंग या भीड़ की प्रतिक्रिया के बजाय प्रक्रिया, प्रमाण और नियम से फैसला समझता है। 15 सेकंड की समयसीमा और सीमित रिव्यू इसकी रणनीतिक कीमत बढ़ाते हैं।
मैच देखते समय यह पांच चरणों वाली पद्धति अपनाइए:
- अंपायर का मूल फैसला और गेंद की वैधता नोट करें।
- बल्लेबाज, पैड, बल्ले और विकेटकीपर की स्थिति देखें।
- समीक्षा में अल्ट्राएज, हॉट स्पॉट और हॉक-आई का अलग-अलग अर्थ समझें।
- अंपायर कॉल लागू है या नहीं, यह जांचें।
- रिव्यू बचा, खत्म हुआ या मूल फैसला कायम रहा—तीनों को अलग परिणाम मानें।
याद रखिए, रिव्यू लेने की सही रणनीति पिच, गेंदबाज और मैच की स्थिति पर निर्भर करती है। शुरुआती पावरप्ले में एक रिव्यू बचाना कभी-कभी अंतिम ओवर के संभावित कैच से अधिक मूल्यवान हो सकता है; दूसरी ओर, प्रमुख बल्लेबाज के विकेट पर तत्काल समीक्षा उचित हो सकती है। इंडियन प्रीमियर लीग 2026, भारत की घरेलू प्रतियोगिताओं और अंतरराष्ट्रीय टेस्ट मैचों में यही गणना कप्तान के निर्णय को प्रभावित करेगी। पिच रिपोर्ट पर प्रकाशित मैच समीक्षा पढ़ते समय अब आप देख सकेंगे कि विश्लेषक केवल “रिव्यू सफल” क्यों नहीं लिखता, बल्कि निर्णय की गुणवत्ता और भविष्य की रणनीति भी समझाता है। बल्लेबाजी और गेंदबाजी रणनीति का उन्नत विश्लेषण इस समझ को आगे बढ़ाने का अच्छा स्रोत है।

अंतिम निष्कर्ष सीधा है: डीआरएस निष्पक्षता बढ़ाता है, पर अचूकता की गारंटी नहीं देता। हॉक-आई, अल्ट्राएज और हॉट स्पॉट प्रमाण देते हैं; तीसरा अंपायर उन प्रमाणों को क्रिकेट नियमों के अनुसार पढ़ता है। अंपायर कॉल को समझे बिना डीआरएस पर राय बनाना अधूरा है। पिच रिपोर्ट के साथ बने रहिए—यहां मैच समीक्षा, खिलाड़ी आंकड़े, आईपीएल कवरेज और रणनीतिक विश्लेषण का उद्देश्य यही है कि आपका क्रिकेट ज्ञान सिर्फ स्कोरकार्ड तक सीमित न रहे।
आज की समीक्षा को अधिक समझदारी से पढ़ने के लिए यह अंतिम संसाधन उपयोगी रहेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: क्रिकेट में डीआरएस क्या है?
उत्तर: डीआरएस यानी निर्णय समीक्षा प्रणाली, अंपायर के फैसले की तकनीकी दोबारा जांच करने की प्रक्रिया है। इसमें तीसरा अंपायर हॉक-आई, अल्ट्राएज, हॉट स्पॉट और वीडियो रिप्ले का उपयोग कर निर्णय की समीक्षा करता है। इसका लक्ष्य स्पष्ट गलती सुधारना है, हर करीबी फैसले को बदलना नहीं। नियमों के अनुसार टीम को सीमित रिव्यू मिलते हैं और सामान्यतः लगभग 15 सेकंड में संकेत देना होता है।
प्रश्न: डीआरएस कैसे लिया जाता है?
उत्तर: डीआरएस लेने के लिए कप्तान या अधिकृत बल्लेबाज को लगभग 15 सेकंड के भीतर दोनों हाथों से “टी” का संकेत देना होता है। आउट दिए गए बल्लेबाज को आउट फैसले के खिलाफ समीक्षा मांगनी होती है, जबकि नॉट आउट फैसले के खिलाफ क्षेत्ररक्षण कप्तान अनुरोध करता है। देर से दिया गया संकेत स्वीकार नहीं किया जा सकता। तीसरा अंपायर पहले समीक्षा की वैधता और फिर उपलब्ध तकनीकी प्रमाण जांचता है।
प्रश्न: डीआरएस और अंपायर कॉल में क्या अंतर है?
उत्तर: डीआरएस पूरी समीक्षा प्रक्रिया है, जबकि अंपायर कॉल करीबी एल्बीडब्ल्यू परिणाम को संभालने वाला नियम है। यदि हॉक-आई का अनुमान निर्णायक सीमा तक स्पष्ट नहीं हो, तो मैदानी अंपायर का मूल फैसला कायम रहता है। ऐसे मामलों में रिव्यू सामान्यतः टीम के पास बचा रहता है। इसलिए अंपायर कॉल को तकनीकी विफलता कहना सही नहीं; यह अनिश्चितता के लिए बनाई गई सुरक्षा व्यवस्था है।
प्रश्न: एल्बीडब्ल्यू में डीआरएस क्यों असफल हो सकता है?
उत्तर: एल्बीडब्ल्यू समीक्षा पिचिंग, इम्पैक्ट और विकेट के तीन चरणों में से किसी एक पर रुक सकती है। गेंद लेग स्टंप के बाहर पिच हो, पैड से संपर्क स्टंप की रेखा के बाहर हो या हॉक-आई विकेट पर टकराव स्पष्ट न दिखाए, तो आउट फैसला नहीं बदलेगा। नो-बॉल की जांच भी पहले होती है। अंपायर कॉल लागू होने पर मूल फैसला बरकरार रह सकता है, भले समीक्षा पूरी तरह बेकार न हो।
प्रश्न: डीआरएस में कितने रिव्यू मिलते हैं?
उत्तर: रिव्यू की संख्या प्रारूप और प्रतियोगिता के आधिकारिक नियमों पर निर्भर करती है, इसलिए हर मैच में समान संख्या नहीं होती। टेस्ट और सीमित ओवरों के क्रिकेट में टीमों को पारी या खेल-खंड के अनुसार सीमित चुनौतियां मिलती हैं। सफल रिव्यू और अंपायर कॉल सामान्यतः चुनौती बचा सकते हैं, जबकि असफल समीक्षा खर्च हो जाती है। मैच शुरू होने से पहले अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद या संबंधित बोर्ड की खेल शर्तें देखना सबसे सुरक्षित तरीका है।
प्रश्न: क्या हॉक-आई और अल्ट्राएज एक ही तकनीक हैं?
उत्तर: नहीं, हॉक-आई गेंद की दिशा और विकेट पर संभावित प्रभाव का अनुमान लगाता है, जबकि अल्ट्राएज ध्वनि तरंगों से बल्ले के किनारे का संकेत खोजता है। हॉट स्पॉट इन्फ्रारेड चित्रों के माध्यम से संपर्क का स्थान दिखाने में मदद करता है। इन तीनों का काम अलग है, इसलिए तीसरा अंपायर उन्हें एक-दूसरे के विकल्प के रूप में नहीं देखता। कैमरा कोण, ध्वनि और प्रसारण गुणवत्ता के अनुसार प्रमाण की स्पष्टता बदल सकती है।
प्रश्न: डीआरएस का सही उपयोग कैसे करें?
उत्तर: डीआरएस का सही उपयोग भावनात्मक अपील के बजाय गेंद की दिशा, संपर्क और अंपायर के मूल फैसले का मूल्यांकन करके किया जाता है। विकेटकीपर, गेंदबाज और क्षेत्ररक्षक की जानकारी सुनने के बाद कप्तान को रिव्यू बचने की स्थिति भी देखनी चाहिए। एल्बीडब्ल्यू में पैड की रेखा और पिचिंग स्थान, कैच में बल्ले का किनारा और रन-आउट में बेल गिरने का क्षण सबसे महत्वपूर्ण संकेत हैं। प्रमाण कमजोर हो तो रिव्यू बचाना अक्सर अधिक लाभदायक होता है।